मिथिलांचल · भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी

चौरचन (चौठ चाँद)

गणेश और चंद्रदेव को समर्पित मिथिला की विवाहित स्त्रियों का पारंपरिक व्रत — सौभाग्य, संतान-सुख और पारिवारिक समृद्धि के लिए

🌙 वर्ष 2026 में चौरचन — 14 सितंबर, सोमवार

मिथिला शैली में — गणेश जी का उपहास करता चंद्रदेव, और मूषक वाहन के साथ विराजमान गणेश

संक्षिप्त परिचय

पर्व का नाम चौरचन (चौठ चाँद)
अन्य नाम चौठ चाँद, चौठचान, चौरचन पूजा, चतुर्थी चाँद
अंग्रेज़ी नाम Chaurchan Festival / Chauth Chand Festival
धर्म हिन्दू धर्म
क्षेत्र मिथिलांचल (बिहार), नेपाल का तराई क्षेत्र तथा विश्वभर के मैथिल समुदाय
प्रमुख देवता भगवान श्रीगणेश एवं चंद्रदेव
पूजन का उद्देश्य परिवार की सुख-समृद्धि, संतानों की उन्नति, बुद्धि, शिक्षा, आरोग्य एवं विघ्नों का नाश
कौन मनाते हैं? मैथिल परिवार, महिलाएँ, पुरुष, बच्चे एवं विद्यार्थी
हिन्दू माह भाद्रपद मास
पक्ष शुक्ल पक्ष
तिथि चतुर्थी
2026 की तिथि 14 सितंबर 2026 (सोमवार)
चतुर्थी तिथि प्रारंभ 14 सितंबर 2026, प्रातः 04:57 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त 15 सितंबर 2026, प्रातः 06:54 बजे
चंद्रोदय 14 सितंबर 2026, सायं 07:36 बजे (दरभंगा, बिहार)
पूजा का शुभ समय चंद्रोदय के बाद, सायं 07:36 बजे से रात्रि तक (स्थानीय पंचांग अनुसार)
पूजा का समय सायंकाल, चंद्रोदय के पश्चात (स्थानीय पंचांग अनुसार)
मुख्य प्रसाद दही, चूड़ा, केला, नारियल, खीर, मिठाई, मौसमी फल एवं पारंपरिक नैवेद्य
विशेष परंपरा बाँस की डलिया (डाला) में फल एवं प्रसाद सजाकर चंद्रदेव और भगवान गणेश की पूजा की जाती है।
मुख्य मान्यता इस दिन भगवान गणेश एवं चंद्रदेव की पूजा से बुद्धि, समृद्धि, संतान-सुख एवं परिवार की मंगलकामना पूर्ण होती है।
चंद्र-दर्शन मिथिला परंपरा में चंद्रमा को अर्घ्य देकर विधिपूर्वक दर्शन किया जाता है।
महत्व यह मिथिलांचल का प्रमुख सांस्कृतिक एवं पारिवारिक पर्व है, जो गणेश पूजा और चंद्र आराधना का अद्भुत संगम माना जाता है।

मूल कथा — गणेश और चंद्रदेव

मैथिली लोक-कथा

एक बार भगवान गणेश अपने वाहन मूषक पर सवार होकर कैलाश पर्वत का भ्रमण कर रहे थे। तभी चंद्रदेव को उनका विचित्र रूप — बड़ा उदर, हाथी का मुख — देखकर हँसी आ गई, और उन्होंने अपने सुंदर रूप पर गर्व करते हुए गणेश जी का उपहास कर दिया।

अहंकारपूर्ण इस हँसी से क्रोधित होकर गणेश जी ने चंद्रदेव को श्राप दिया कि जिस रूप पर तुम्हें इतना अभिमान है, वह क्षीण हो जाएगा — और जो कोई भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को तुम्हें देखेगा, वह मिथ्या दोष यानी झूठे आरोप और कलंक का शिकार होगा। बाद में चंद्रदेव के क्षमा-याचना करने पर श्राप पूर्णतः नहीं, आंशिक रूप से शांत हुआ — इसी कारण चंद्रमा घटता-बढ़ता रहता है, और भाद्रपद चतुर्थी की रात्रि आज भी चंद्र-दर्शन के लिए वर्जित मानी जाती है।

श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि — क्यों माना जाता है यह दोष सच में लगता है

श्रीमद्भागवत, दशम स्कंध

पौराणिक कथाओं में इसी श्राप को श्रीकृष्ण की कथा से भी जोड़ा गया है। कहा जाता है कि एक बार श्रीकृष्ण से अनजाने में भाद्रपद चतुर्थी को चंद्र-दर्शन हो गया, जिसके बाद उन पर स्यमंतक मणि — एक अत्यंत मूल्यवान रत्न — चुराने का झूठा आरोप लग गया। नारद मुनि ने उन्हें इस दोष का कारण बताया, और परामर्श दिया कि चतुर्थी व्रत व चंद्र-पूजन से ही मुक्ति संभव है। इसी घटना के बाद से यह मान्यता दृढ़ हुई कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चांद देखना अशुभ है।

पूजा का समय और विधि

चौरचन की पूजा दिन में नहीं, बल्कि संध्याकाल में चंद्रोदय के बाद होती है। घर की व्रती स्त्री (प्रायः घर की वरिष्ठ या विवाहित महिला) आँगन में यह पूजा संपन्न कराती है।

  1. आँगन या छत को साफ कर वहाँ अरिपन (चावल के आटे से बनी पारंपरिक अल्पना) बनाई जाती है।
  2. बाँस के बने सूप (winnowing tray) में फल, मिठाई, खीर, पूड़ी आदि पकवान सजाकर रखे जाते हैं।
  3. चंद्रोदय होते ही व्रती स्त्री सूप को हाथों में उठाकर चंद्रदेव की ओर अर्घ्य देती है — ध्यान रहे, सीधे चांद को देखा नहीं जाता, अर्घ्य परोक्ष रूप से (जल में प्रतिबिंब या नज़र नीची रखकर) दिया जाता है।
  4. दूध और जल से चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है, साथ ही गणेश जी की भी पूजा होती है।
  5. घर के पुरुष सदस्य परंपरागत रूप से मारर भाँगना (मिट्टी के पात्र फोड़ने की रस्म) करते हैं — यह क्षेत्रीय परंपरा का हिस्सा है।
  6. पूजा के पश्चात परिवार में प्रसाद वितरण होता है और सब मिलकर भोजन करते हैं।

पूजा सामग्री

दूधदहीखीरपकवान मौसमी फलसिंदूरतिलसुपारी चंदनशुद्ध जलशंखनया वस्त्र गौर चावल का आटाअष्टदल (अल्पना)दूर्वा दलबेलपत्र सफेद फूल-मालाअक्षतकेले का पत्ताआम का पत्ता कलशबाँस का सूपदीपडाली

भोग और पारंपरिक पकवान

चौरचन के भोग में मिथिला के घरेलू पकवानों की झलक मिलती है — कोई आधुनिक मिठाई नहीं, बल्कि सीधे रसोई से बने व्यंजन:

ये सभी सामग्री बाँस के सूप में सजाकर ही चंद्रदेव को अर्पित की जाती हैं — यह दृश्य मिथिला के हर आँगन में चतुर्थी की शाम एक जैसा दिखता है।

अगर भूल से चांद दिख जाए तो क्या करें?

शास्त्रों — विशेषतः श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 56वें-57वें अध्याय — के अनुसार, यदि किसी को भूल से भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का चंद्र-दर्शन हो जाए, तो घबराने की आवश्यकता नहीं। इसका सरल उपाय है:

  • स्यमंतक मणि की कथा श्रद्धापूर्वक सुनना या पढ़ना — मान्यता है कि स्वयं श्रीकृष्ण भी इसी उपाय से मिथ्या दोष से मुक्त हुए थे।
  • गणेश चतुर्थी व्रत व चंद्र-पूजन विधिपूर्वक करना।
  • क्षेत्रीय परंपरा अनुसार परिवार के बड़ों से दोष-निवारण मंत्र या संकल्प करवाना।

नोट: यह पारंपरिक मान्यता है, कोई चिकित्सकीय या कानूनी सलाह नहीं।

पर्व का महत्व

मिथिला में मान्यता है कि जो स्त्री विधिपूर्वक चौरचन व्रत रखती और चंद्र-गणेश की पूजा करती है, उसे —

यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मैथिल पारिवारिक संस्कृति, स्त्रियों की सामूहिक आस्था और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही अरिपन, सूप-सजावट जैसी लोक-कलाओं को भी जीवित रखता है।

क्षेत्रीय नाम

यह एक ही पर्व है, पर मिथिला के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है — चौरचन, चौठ चाँद, चौठ चन्द्र, चारचन्ना पावनि, चोरचन पूजा। सभी नाम एक ही आराधना और परंपरा की ओर संकेत करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चौरचन और चौठी चाँद में क्या फर्क है?

कोई फर्क नहीं — दोनों एक ही मैथिल पर्व के अलग-अलग नाम हैं।

क्या यह विद्यार्थियों/स्कूलों से जुड़ा पर्व है?

नहीं। यह मुख्यतः विवाहित स्त्रियों का व्रत है। स्कूल-आधारित उत्सव जैसा कोई प्रामाणिक प्रचलन नहीं मिलता।

चौरचन 2026 में कब है?

सोमवार, 14 सितंबर 2026 — गणेश चतुर्थी के ही दिन शाम को।

क्या चौरचन और गणेश चतुर्थी एक ही दिन हैं?

हाँ, दोनों एक ही तिथि — भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी — को पड़ते हैं। पूरे भारत में यह गणेश चतुर्थी के रूप में और मिथिला में विशेष रूप से चौरचन के रूप में मनाया जाता है।

चांद क्यों नहीं देखना चाहिए?

गणेश जी के श्राप की मान्यता अनुसार, इस दिन चंद्र-दर्शन से मिथ्या दोष (झूठा आरोप/कलंक) लगता है।

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