मुहूर्त में अलग-अलग समय क्यों दिखते हैं?
अनंत चतुर्दशी की तिथि और पूजा-मुहूर्त एक ही चीज़ नहीं हैं। चतुर्दशी तिथि 24 सितंबर 2026 की रात 11:18 बजे शुरू होकर 25 सितंबर की रात 11:06 बजे समाप्त होती है। पूजा का उपयुक्त समय सूर्योदय, सूर्यास्त और स्थान की गणना के कारण शहर-दर-शहर बदल सकता है।
इसी कारण अलग-अलग वेबसाइटों पर मुहूर्त की शुरुआत अलग दिखाई दे सकती है। उदाहरण के लिए, 2026 के लिए Drik Panchang के Bengaluru city calculation में अनंत चतुर्दशी पूजा मुहूर्त 06:09 बजे से 23:06 बजे तक दिया गया है। यह पूरे भारत के लिए एक universal time नहीं है—यह उस शहर की local calculation है।
संक्षिप्त परिचय
| पर्व का नाम | अनंत चतुर्दशी (अनंत पूजा) |
|---|---|
| अन्य नाम | अनंत पूजा, अनंत व्रत, अनंत सूत्र पर्व |
| अंग्रेज़ी नाम | Anant Chaturdashi Festival |
| धर्म | हिन्दू धर्म |
| क्षेत्र | संपूर्ण भारतवर्ष; मिथिलांचल (बिहार), नेपाल तराई तथा विश्वभर के हिन्दू व मैथिल समुदाय |
| प्रमुख देवता | भगवान विष्णु (अनंत रूप), शेषनाग एवं यमुना देवी |
| पूजन का उद्देश्य | परंपरागत मान्यता में सुख-समृद्धि, शांति और मंगल की कामना; अनंत व्रत एवं विष्णु-पूजन |
| कौन मनाते हैं? | हिन्दू परिवार, स्त्रियाँ, पुरुष एवं बच्चे |
| हिन्दू माह | भाद्रपद मास |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| तिथि | चतुर्दशी |
| 2026 की तिथि | 25 सितंबर 2026 (शुक्रवार) |
| चतुर्दशी तिथि प्रारंभ | 24 सितंबर 2026, रात्रि 11:18 बजे |
| चतुर्दशी तिथि समाप्त | 25 सितंबर 2026, रात्रि 11:06 बजे |
| पूजा का समय | 25 सितंबर 2026 को पूजा का समय स्थान के अनुसार बदलता है। स्थानीय पंचांग के शहर-विशिष्ट मुहूर्त को प्राथमिकता दें; 11:06 बजे रात चतुर्दशी तिथि समाप्त होती है। |
| गणेश विसर्जन | इसी दिन दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन एवं विसर्जन किया जाता है |
| मुख्य अनुष्ठान | चौदह गाँठों वाला अनंत सूत्र दाहिने (पुरुष) या बाएं (स्त्री) हाथ में बाँधना |
| प्रचलित नैवेद्य | पंचामृत, फल, खीर, मिठाई तथा क्षेत्र/परिवार के अनुसार अन्य सात्त्विक नैवेद्य |
| मुख्य कथा | कौण्डिन्य ऋषि व सुशीला की कथा; युधिष्ठिर एवं पांडवों का प्रसंग |
| महत्व | भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना, व्रत और अनंत सूत्र धारण से जुड़ा प्रमुख पर्व |
मिथिला में अनंत चतुर्दशी — अपनी परंपरा के अनुसार
यह सिर्फ “अनंत सूत्र बाँधने” का पर्व नहीं है
मिथिला में अनंत पूजा की अपनी विशिष्ट घरेलू और पुरोहित-आधारित परंपरा मिलती है। उपलब्ध मैथिल स्रोतों में 14 ग्रंथियों वाला अनंत डोरक, क्षीर-सागर का प्रतीक, 14 अर्पण और पुरोहित के हाथ से अनंत डोरा धारण करने जैसी परंपराओं का वर्णन मिलता है।
इसलिए इस पेज पर सामान्य उत्तर भारतीय पूजा-विधि के साथ-साथ मिथिला में प्रचलित रूप को अलग दिखाना अधिक उपयोगी है। हर गाँव, परिवार और कुल की विधि बिल्कुल समान हो—ऐसा मानना सही नहीं होगा।
मिथिला की विशेष पूजा सामग्री
१४ ग्रंथियों का मिथिला संदर्भ
मैथिल परंपरा से जुड़े स्रोत 14 ग्रंथियों को भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप और 14 लोकों से जोड़कर समझाते हैं। कुछ स्थानीय विवरणों में अलग-अलग ग्रंथियों के साथ भगवान के नामों का आवाहन भी बताया गया है।
पुरोहित की भूमिका
मिथिला के कई स्थानों में अनंत डोरा केवल बाजार से खरीदकर खुद बांध लेने के बजाय पुरोहित/पंडित द्वारा पूजा और मंत्रोच्चार के बाद धारण करने की परंपरा मिलती है। 2024–25 के मिथिला क्षेत्रीय समाचार विवरणों में भी यह परंपरा दर्ज है।
सबसे जरूरी जानकारी — पहले यह पढ़ें
अगर आपके पास सिर्फ 15–20 मिनट हैं
स्नान/स्वच्छता के बाद पूजा स्थान साफ करें, विष्णु के अनंत रूप का स्मरण करें, जल-पुष्प-फल या उपलब्ध सात्विक नैवेद्य अर्पित करें, अनंत व्रत कथा का संक्षिप्त पाठ/श्रवण करें और अपनी परंपरा के अनुसार अनंत सूत्र धारण करें।
अगर आप व्रत कर रहे हैं
व्रत की पद्धति परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है। अपनी पारिवारिक परंपरा या स्थानीय पंचांग की विधि को प्राथमिकता दें। निर्जल, फलाहार या अन्य नियम को सभी के लिए अनिवार्य बताना उचित नहीं है।
अगर घर में गणेश जी की प्रतिमा है
अनंत चतुर्दशी गणेशोत्सव के समापन और विसर्जन से जुड़ा प्रमुख दिन है। लेकिन विसर्जन का समय स्थानीय प्रशासन, घाट/तालाब के नियम और आपके शहर के पंचांग के अनुसार तय करें।
अगर अनंत सूत्र उपलब्ध नहीं है
सिर्फ सामग्री न मिल पाने के कारण पूजा को असंभव न समझें। पूजा की भावना और आपकी पारिवारिक परंपरा महत्वपूर्ण है। स्थानीय पुरोहित से पूछकर धागे की सामग्री और गांठों की परंपरा तय की जा सकती है।
घर पर करने योग्य सरल पूजा क्रम
यह एक सरल, सामान्य घरेलू क्रम है। यदि आपके परिवार/सम्प्रदाय में अलग विधि है, तो वही मानें।
- तैयारी: पूजा स्थान साफ करें, स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और आवश्यक सामग्री एक जगह रखें।
- संकल्प: अपने मन में पूजा का उद्देश्य रखें—शांति, सद्बुद्धि, परिवार का मंगल और भगवान विष्णु की भक्ति।
- पूजन: कलश/भगवान विष्णु के चित्र या प्रतिमा के सामने जल, अक्षत, पुष्प, दीप, धूप और उपलब्ध नैवेद्य अर्पित करें।
- अनंत सूत्र: अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार चौदह गांठ वाले अनंत सूत्र की पूजा करके धारण करें।
- कथा और प्रार्थना: कौण्डिन्य-सुशीला की अनंत व्रत कथा पढ़ें/सुनें और अंत में आरती या प्रार्थना करें।
- गणेश विसर्जन: यदि घर में गणेश प्रतिमा है, तो स्थानीय व्यवस्था और पर्यावरण/नगरपालिका के नियमों के अनुसार विसर्जन करें।
अपनी पूजा की चेकलिस्ट
मिथिला परिवार के लिए तैयारी — आसान चेकलिस्ट
किन बातों को बिना जांचे न मानें
❌ एक ही मुहूर्त पूरे भारत के लिए
गलत। पंचांग के समय स्थान के अनुसार बदलते हैं। उदाहरण के लिए 25 सितंबर 2026 का उपलब्ध पूजा समय अलग-अलग शहरों में अलग है।
❌ सूत्र टूटना निश्चित रूप से अशुभ है
ऐसी बात को सार्वभौमिक धार्मिक नियम की तरह प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। इसे लेकर क्षेत्रीय और पारिवारिक मान्यताएँ अलग हो सकती हैं। घबराने के बजाय अपनी परंपरा के अनुसार नया सूत्र धारण करने की सलाह लें।
❌ हर व्यक्ति के लिए एक जैसा व्रत
व्रत की कठोरता और भोजन के नियम परिवार, सम्प्रदाय और व्यक्ति की परिस्थिति के अनुसार अलग हो सकते हैं। स्वास्थ्य कारणों से उपवास बदलना पड़े तो उसे धार्मिक असफलता न समझें।
❌ पूजा के लिए महंगी सामग्री जरूरी है
वेब पर दिखने वाली लंबी shopping lists को अनिवार्य न समझें। उपलब्ध सामग्री और अपनी परंपरा के अनुसार सरल पूजा भी की जा सकती है।
स्थान के अनुसार समय क्यों बदलता है?
ShivMarg पर सबसे उपयोगी तरीका: अपने शहर/स्थान का नाम देकर स्थानीय पंचांग समय देखें। सूर्योदय, सूर्यास्त और तिथि की गणना के कारण Delhi, Mumbai, Darbhanga, Bengaluru या विदेशों में पूजा और विसर्जन के मुहूर्त अलग हो सकते हैं।
इस पेज पर दिए गए 2026 के तिथि-आरंभ/समाप्ति समय को संदर्भ मानें; स्थानीय पूजा मुहूर्त के लिए शहर-विशिष्ट पंचांग को प्राथमिकता दें।
आज के जीवन में अनंत चतुर्दशी का अर्थ
अनंत चतुर्दशी को केवल “क्या चढ़ाना है?” तक सीमित करने के बजाय इसे अनुशासन, कृतज्ञता और निरंतरता के अवसर की तरह भी देखा जा सकता है। अनंत सूत्र की परंपरा व्यक्ति को अपने संकल्प को याद रखने का प्रतीक दे सकती है।
इस दिन परिवार साथ बैठकर कथा सुन सकता है, बच्चों को पर्व का अर्थ समझा सकता है, घर में उपलब्ध भोजन से सात्विक प्रसाद बना सकता है और गणेश विसर्जन में स्वच्छता तथा सुरक्षित सार्वजनिक व्यवहार का ध्यान रख सकता है।
मिथिला परंपरा के बारे में स्रोत-नोट
क्षेत्रीय आधार: मिथिला से जुड़े उपलब्ध विवरणों में अनंत डोरा, १४ ग्रंथियाँ, पुरोहित द्वारा धारण, क्षीर-सागर प्रतीक तथा कुछ स्थानों पर १४ पूड़ी और १४ पुआ जैसी परंपराएँ दर्ज हैं।
स्रोत, गणना और editorial policy
१. पंचांग/समय: 2026 की तिथि और समय को city-specific Panchang calculations से cross-check किया जाता है। Drik Panchang की 2026 Bengaluru calculation में चतुर्दशी 24 सितंबर 23:18 से 25 सितंबर 23:06 तक और पूजा-मुहूर्त 06:09–23:06 दिया गया है। अलग शहरों में sunrise/sunset के कारण मुहूर्त बदल सकता है।
२. शिवमार्ग गणना: ShivMarg Panchang Calculator में उपलब्ध परिणाम को independent cross-check के रूप में देखा जाता है। यदि दो गणनाओं में मामूली अंतर हो, तो शहर, सूर्योदय-सूर्यास्त और गणना-पद्धति देखकर कारण बताया जाना चाहिए—बिना किसी एक समय को पूरे भारत का universal मुहूर्त घोषित किए।
३. धार्मिक परंपरा: कथा, अनंत डोरा, 14 ग्रंथियाँ, व्रत, हाथ में धारण करने की विधि और पूजा सामग्री में क्षेत्रीय/पारिवारिक भिन्नताएँ हो सकती हैं। ऐसी बातों को पक्के वैज्ञानिक तथ्य की तरह नहीं, बल्कि परंपरा/मान्यता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
४. उपयोगकर्ता के लिए सबसे सुरक्षित नियम: तिथि के लिए verified Panchang देखें; पूजा के लिए अपने शहर का local muhurat देखें; और यदि परिवार/कुल-परंपरा में अलग विधि हो तो स्थानीय पुरोहित की सलाह को प्राथमिकता दें।
मूल कथा — कौण्डिन्य ऋषि और सुशीला
प्राचीन काल में कौण्डिन्य ऋषि की पत्नी सुशीला ने अनंत चतुर्दशी का व्रत रखा और अपनी भुजा पर अनंत सूत्र बांधा। कुछ समय बाद कौण्डिन्य ऋषि को यह धागा साधारण लगा और उन्होंने अनजाने में उसे अग्नि में जला दिया। इस अनादर के कारण ऋषि पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा — उनकी संपत्ति नष्ट हो गई और वे दरिद्र हो गए।
अपनी भूल का एहसास होने पर कौण्डिन्य ऋषि वन में भगवान अनंत (विष्णु) को खोजने निकल पड़े। लंबी तपस्या और भटकन के बाद स्वयं भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन देकर पुनः श्रद्धापूर्वक अनंत व्रत करने की सलाह दी। चौदह वर्षों तक विधिपूर्वक व्रत करने से कौण्डिन्य ऋषि का परिवार पुनः सुख-समृद्धि से भर गया — इसी घटना से अनंत चतुर्दशी व्रत की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।
युधिष्ठिर और पांडवों का प्रसंग
महाभारत के अनुसार, जब युधिष्ठिर द्यूतक्रीड़ा (जुए) में अपना संपूर्ण राज्य और वैभव हार गए, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी का व्रत रखने और अनंत सूत्र धारण करने की सलाह दी। मान्यता है कि इसी व्रत के प्रताप से पांडवों को बारह वर्षों के वनवास और अज्ञातवास के पश्चात पुनः उनका खोया हुआ राज्य प्राप्त हुआ। इसी कारण अनंत चतुर्दशी को संकटों से मुक्ति और खोए हुए सुख-समृद्धि की पुनर्प्राप्ति का पर्व माना जाता है।
पूजा का समय और विधि
अनंत चतुर्दशी की पूजा प्रातःकाल स्नान के पश्चात उदया तिथि में की जाती है। घर के आँगन या पूजा स्थल को स्वच्छ कर विधिवत अनुष्ठान संपन्न कराया जाता है।
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करें।
- कलश की स्थापना कर उस पर कुश से बना अष्टदल कमल रखें, तथा भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- सिंदूर, केसर व हल्दी में डुबोकर तैयार किए गए चौदह गाँठों वाले रेशमी धागे (अनंत सूत्र) को कलश के समक्ष रखकर विधिवत पूजा करें।
- पंचामृत, फल, मिठाई एवं खीर का भोग अर्पित करें, तथा अनंत व्रत कथा (कौण्डिन्य-सुशीला प्रसंग) श्रद्धापूर्वक सुनें या पढ़ें।
- पूजा संपन्न होने पर पुरुष दाहिने हाथ में और स्त्रियाँ बाएँ हाथ में अनंत सूत्र बाँधें।
- इसी दिन विधिवत आरती के साथ गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन कर दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन किया जाता है।
पूजा सामग्री
भोग और पारंपरिक पकवान
अनंत चतुर्दशी के भोग में सात्विक व्यंजनों का विशेष महत्व है — यह दस दिवसीय गणेशोत्सव के समापन का भी दिन है, इसलिए भोग में विविधता देखने को मिलती है:
- खीर — मुख्य भोग
- पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद व शक्कर का मिश्रण
- मोदक व लड्डू — गणेश विसर्जन से जुड़े पारंपरिक प्रसाद
- मौसमी फल: केला, सेब, अनार
पूजा उपरांत परिवार में प्रसाद वितरित किया जाता है और सामूहिक रूप से गणेश विसर्जन की शोभायात्रा में भाग लिया जाता है।
अनंत सूत्र टूट जाए या खो जाए तो क्या करें? — परंपरा के अनुसार
पौराणिक मान्यता के अनुसार, यदि वर्ष भर पहना अनंत सूत्र स्वयं ही टूट जाए या खो जाए तो इसे अशुभ नहीं माना जाता — इसका सरल समाधान है:
- पुराने सूत्र के संबंध में परिवार/स्थानीय परंपरा का पालन करें; उसे नदी में डालना आवश्यक न मानें। जल-स्रोतों को प्रदूषित करने से बचें।
- परंपरा में नया अनंत सूत्र अगले अनंत चतुर्दशी पर धारण किया जाता है; यदि तुरंत समाधान चाहिए तो अपने परिवार के पुरोहित/परंपरा से पूछें।
- कौण्डिन्य ऋषि की कथा श्रद्धापूर्वक सुनना — इससे विश्वास दृढ़ होता है कि भगवान विष्णु की कृपा अनंत है।
नोट: यह पारंपरिक मान्यता है, कोई चिकित्सकीय या कानूनी सलाह नहीं।
पर्व का महत्व
मान्यता है कि जो श्रद्धालु विधिपूर्वक अनंत चतुर्दशी व्रत रखता और अनंत सूत्र धारण करता है, उसे —
- जीवन के संकटों और बाधाओं से मुक्ति मिलती है
- खोई हुई सुख-समृद्धि पुनः प्राप्त होती है (पांडवों के प्रसंग अनुसार)
- भगवान विष्णु और शेषनाग का आशीर्वाद प्राप्त होता है
- दस दिवसीय गणेशोत्सव का शुभ एवं शांतिपूर्ण समापन होता है
मिथिलांचल में भी यह पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है, जहाँ गणेश विसर्जन की शोभायात्राओं के साथ-साथ घर-घर में अनंत सूत्र बाँधने और कथा-श्रवण की परंपरा निभाई जाती है।
क्षेत्रीय नाम
यह एक ही पर्व है, पर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है — अनंत चतुर्दशी, अनंत पूजा, अनंत व्रत। सभी नाम एक ही आराधना और परंपरा की ओर संकेत करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अनंत चतुर्दशी 2026 में कब है?
शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 — दस दिवसीय गणेशोत्सव के समापन के साथ।
अनंत सूत्र किस हाथ में बांधा जाता है?
पुरुष दाहिने हाथ में और स्त्रियाँ बाएँ हाथ में अनंत सूत्र बांधती हैं।
क्या अनंत चतुर्दशी और गणेश विसर्जन एक ही दिन हैं?
हाँ, इसी दिन दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन एवं विसर्जन किया जाता है।
अनंत चतुर्दशी की मुख्य कथा कौन-सी है?
कौण्डिन्य ऋषि और उनकी पत्नी सुशीला की कथा मुख्य रूप से सुनाई जाती है, साथ ही महाभारत में युधिष्ठिर का प्रसंग भी प्रसिद्ध है।
अनंत चतुर्दशी का पूजा मुहूर्त क्या है?
25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी है और चतुर्दशी तिथि रात 11:06 बजे तक रहती है। पूजा-मुहूर्त शहर के अनुसार बदलता है। उदाहरण के लिए Drik Panchang की Bengaluru calculation में 06:09 से 23:06 तक पूजा-मुहूर्त दिया गया है। अपने शहर की local Panchang calculation को प्राथमिकता दें।
मिथिला में अनंत चतुर्दशी पर क्या विशेष किया जाता है?
मैथिल परंपरा के कुछ रूपों में १४ ग्रंथियों वाला अनंत डोरक, क्षीर-सागर का प्रतीक पंचामृत, खीरा तथा १४ पूड़ी और १४ पुआ जैसे विशेष अर्पण मिलते हैं। परिवार और क्षेत्र के अनुसार विधि बदल सकती है।
क्या मिथिला में अनंत डोरा पुरोहित से ही बंधवाना चाहिए?
कई मैथिल परिवारों में पुरोहित के मंत्रोच्चार के बाद डोरा धारण करने की परंपरा है। लेकिन यह हर परिवार के लिए एक समान अनिवार्य नियम नहीं माना जाना चाहिए—अपने कुल/परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें।
मिथिला में १४ पूड़ी और १४ पुआ क्यों रखे जाते हैं?
क्षेत्रीय परंपरा में १४ संख्या को अनंत के १४ ग्रंथियों/१४ लोकों के प्रतीकात्मक अर्थ से जोड़ा जाता है। यह विशेष मैथिल/बिहार क्षेत्रीय पूजा-रूप है, सार्वदेशिक अनिवार्यता नहीं।