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✦ शिवाष्टकम् — सम्पूर्ण ८ श्लोक ✦
॥ श्लोक १ ॥
प्राणनाथ, विश्वनाथ — सदानंद
प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं
जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजम् ।
भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं
शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे ॥१॥
शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे
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॥ श्लोक २ ॥
गले रुण्डमाल — सर्पभूषण
गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं महाकालकालं गणेशाधिपालम् ।
जटाजूटगङ्गोत्तरङ्गैर्विशालं शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे ॥२॥
शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे
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॥ श्लोक ३ ॥
भवानीपति — चंद्रशेखर
मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं महामण्डलं भस्मभूषाधरं तम् ।
अनादिं ह्यपारं महामोहमारं शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे ॥३॥
शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे
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॥ श्लोक ४ ॥
कपालधारी — पशुपति
तटाधोनिवासं महाट्टाट्टहासं महापापनाशं सदा सुप्रकाशम् ।
गिरीशं गणेशं सुरेशं महेशं शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे ॥४॥
शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे
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॥ श्लोक ५ ॥
शिव-नेत्र — विश्वरूप
गिरीन्द्रात्मजासङ्गृहीतार्धदेहं गिरौ संस्थितं सर्वदा सन्निगेहम् ।
परब्रह्म ब्रह्मादिभिर्वन्द्यमानं शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे ॥५॥
शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे
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॥ श्लोक ६ ॥
अनादि — मृत्युंजय
कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं पदांभोजनम्राय कामं ददानम् ।
बलीवर्दयानं सुराणां प्रधानं शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे ॥६॥
शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे
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॥ श्लोक ७ ॥
भस्मधारी — श्मशानेश्वर
शरच्चन्द्रगात्रं गुणानन्दपात्रं त्रिनेत्रं पवित्रं धनॆशस्य मित्रम् ।
अपर्णाकळत्रं चरित्रं विचित्रं शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे ॥७॥
शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे
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॥ श्लोक ८ ॥
करुणासागर — जगदीश्वर
हरं सर्पहारं चिताभूविहारं भवं वेदसारं सदा निर्विकारम् ।
श्मशाने वसन्तं मनोजं दहन्तं शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे ॥८॥
शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे
✦ फलश्रुति — Phala Shruti ✦
स्तवं यः प्रभाते नरः शूलपाणेः पठेत्सर्वदा भर्गभावानुरक्तः ।
स पुत्रं धनं धान्यमित्रं कळत्रं विचित्रैः समाराद्य मोक्षं प्रयाति ॥९॥
Śivāṣṭakam-idaṃ puṇyaṃ yaḥ paṭhet śiva-sannidhau | Śivalokam-avāpnoti Śivena saha modate | Ekavāraṃ paṭhen-nityaṃ pāpebhyaḥ parimucyate | Sarvaduḥkha-vinirmuktaḥ śivalokaṃ sa gacchati
जो इस पवित्र शिवाष्टकम् का शिव-सन्निधि में पाठ करता है वह शिवलोक को प्राप्त करता है और शिव के साथ आनंद भोगता है। जो प्रतिदिन एक बार भी इसका पाठ करे, वह पापों से मुक्त हो जाता है और समस्त दुःखों से निर्मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त करता है।
🌙 शिवाष्टकम् — आठ रूपों की महिमा
शिवाष्टकम् में भगवान शिव के आठ प्रमुख रूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र प्रत्येक श्लोक के अंत में "शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे" की स्तुति-पंक्ति के माध्यम से भगवान शिव के विविध स्वरूपों और गुणों का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें शिव के निर्गुण-निराकार ब्रह्म-स्वरूप और सगुण-साकार भवानीपति-स्वरूप — दोनों का अद्भुत समन्वय है। श्मशान के स्वामी से लेकर आनंद-सागर तक — शिव सर्वत्र हैं।
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चंद्रशेखरशिव के ललाट पर चंद्रमा — यह सोम (अमृत) का प्रतीक है। चंद्र की शीतल कला और शिव की तेजस्विता का अद्वैत।
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श्मशानेश्वरश्मशान में निवास — यह मोक्ष और वैराग्य का प्रतीक है। मृत्यु पर विजय पाने वाले शिव श्मशान में आनंद से नाचते हैं।
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शूलपाणि — त्रिशूलत्रिशूल के तीन शूल — सृष्टि, स्थिति और संहार का प्रतीक। इच्छा, ज्ञान और क्रिया-शक्ति का प्रतीक भी।
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करुणासागरश्लोक ८ में शिव को "करुणासमुद्र" कहा — शिव का भय-स्वरूप केवल अज्ञान के लिए है, भक्तों के लिए वे परम करुण हैं।
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