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✦ शिव ताण्डव स्तोत्रम् — सम्पूर्ण १७ श्लोक ✦
॥ श्लोक १ ॥
जटा में गंगा, गले में नाग-माला
जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावि तस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्ड मड्ड मड्ड मन्नि नादवड्ड मर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥
Jaṭāṭavī-galajjala-pravāha-pāvita-sthale | Gale'valambya lambitāṃ bhujaṅga-tuṅga-mālikām | Ḍamaḍ-ḍamaḍ-ḍamaḍ-ḍaman-nināda-vaḍḍamarvayaṃ | Cakāra caṇḍa-tāṇḍavaṃ tanotu naḥ śivaḥ śivam
जिनकी जटाओं के वन से गिरती गंगाजल की धारा से कंठ पवित्र है, जिनके गले में ऊँची नाग-माला लटकती है — डमड् डमड् डमड् डमड् की ध्वनि से डमरू बजाते हुए जिन्होंने चण्ड-ताण्डव किया — वे शिव हमें शिवत्व (कल्याण) प्रदान करें।
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॥ श्लोक २ ॥
ललाट-अग्नि से दिशाएँ प्रज्वलित
जटा कटाह सम्भ्रम भ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवी चिवल्लरी विराजमान मूर्धनि।
धगद्ध गद्ध गज्जलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥
Jaṭā-kaṭāha-sambhrama-bhraman-nilimpa-nirjharī | Vilola-vīci-vallarī-virājamāna-mūrdhani | Dhagad-dhagad-dhagaj-jalal-lalāṭa-paṭṭa-pāvake | Kiśora-candra-śekhare ratiḥ pratiṣaṇaṃ mama
जिनके जटाओं के घड़े में घूमती देव-नदी की चंचल तरंगें मस्तक पर विराजती हैं — धगद् धगद् धगद् करती ललाट-पट्टिका की अग्नि में — बाल-चंद्र के शेखर वाले शिव में मेरी रति (प्रेम) प्रतिक्षण बढ़ती रहे।
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॥ श्लोक ३ ॥
कंठ में हलाहल, कभी-कभी शिव का भजन करूँगा
धरा धरेन्द्र नंदिनी विलासबन्धु बान्धव-
स्फुरद्दि गन्त सन्तति प्रमोद मान मानसे।
कृपा कटाक्ष धोरणी निरुद्ध दुर्धरा पदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥
Dharā-dharendra-nandinī-vilāsa-bandhu-bāndhava | Sphurad-diganta-santati-pramoda-māna-mānase | Kṛpā-kaṭākṣa-dhoraṇī-niruddha-durdhara-āpadi | Kvacid-digambare mano vinodametu vastuni
पर्वत-राज की पुत्री पार्वती के विलास के परम बन्धु — जिनका मन दिशाओं के प्रसार से प्रमुदित है, जो कृपा-कटाक्ष की धारा से दुर्धर विपत्तियों को रोकते हैं — उन दिगम्बर शिव में मेरा मन आनंद प्राप्त करे।
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॥ श्लोक ४ ॥
नाग-कुण्डल, भस्म-शरीर
जटा भुजङ्ग पिङ्ग लस्फुरत्फणा मणि प्रभा-
कदम्ब कुङ्कुम द्रव प्रलिप्त दिग्व धूमुखे।
मदान्ध सिन्धु रस्फुरत्त्व गुत्तरी यमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥
Jaṭā-bhujaṅga-piṅgala-sphurat-phaṇā-maṇi-prabhā | Kadamba-kuṅkuma-drava-praliptā-dig-vadhū-mukhe | Madāndha-sindhura-sphurattva-guttarīya-medure | Mano vinodamadbhutaṃ bibhartu bhūta-bhartari
जटाओं में लिपटे पीले सर्प के फन की मणि की चमक से जिन्होंने कुंकुम-द्रव की भाँति दिशाओं के मुख को रंग दिया है — मत्त हाथी की खाल को उत्तरीय बनाने वाले — उन भूतपति शिव में मेरे मन को अद्भुत विनोद मिले।
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॥ श्लोक ५ ॥
कामदेव को भस्म करने वाले
सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेख शेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधू सराङ्घ्रि पीठभूः।
भुजङ्ग राज मालया निबद्ध जाट जूटक-
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥
Sahasra-locana-prabhṛtya-śeṣa-lekha-śekhara | Prasūna-dhūli-dhoraṇī-vidhūsara-aṅghri-pīṭha-bhūḥ | Bhujaṅga-rāja-mālayā nibaddha-jāṭa-jūṭakaḥ | Śriyai cirāya jāyatāṃ cakora-bandhu-śekharaḥ
इंद्र और समस्त देवताओं के मुकुट की फूल-धूलि से जिनके पाद-पीठ पर धूसरता छाई है — नागराज की माला से जटाजूट बांधे हुए — चकोर के मित्र (चंद्रमा) को शिरोभूषण बनाने वाले शिव चिरकाल तक मुझे संपत्ति प्रदान करें।
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॥ श्लोक ६ ॥
विष-कंठ, त्रिनेत्र, त्रिशूलधारी
ललाट चत्व रज्वल द्धनञ्जय स्फुलिङ्गभा-
निपीत पञ्च सायकं नमन्नि लिम्प नायकम्।
सुधा मयूख लेखया विराज मानशेखरं
महा कपालि सम्पदे शिरो जटाल मस्तु नः॥
Lalāṭa-catvara-jvalad-dhanañjaya-sphuliṅga-bhā | Nipīta-pañca-sāyakaṃ naman-nilimpa-nāyakam | Sudhā-mayūkha-lekhayā virājamāna-śekharaṃ | Mahā-kapāli-sampade-śiro-jaṭālam-astu naḥ
ललाट के चत्वर में जलती अग्नि की चिनगारियों से कामदेव को भस्म करने वाले, देव-नायकों को नमाने वाले — अमृत-किरणों की रेखा (चंद्रमा) से मस्तक पर विराजमान — महा-कपाली शिव की जटा हमें संपत्ति प्रदान करे।
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॥ श्लोक ७ ॥
कदा सदाशिवं भजे — रावण की प्रार्थना
कराल भाल पट्टिका धगद्ध गद्ध गज्जल-
द्धनञ्जया हुती कृत प्रचण्ड पञ्च सायके।
धरा धरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्र पत्रक-
प्रकल्प नैक शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥
Karāla-bhāla-paṭṭikā-dhagad-dhagad-dhagaj-jalad | Dhanañjaya-āhutī-kṛta-pracaṇḍa-pañca-sāyake | Dharā-dharendra-nandinī-kuca-agra-citra-patraka | Prakalpa-naika-śilpini tri-locane ratir-mama
भयंकर ललाट-पट्टिका की धगद्-धगद् जलती अग्नि में कामदेव को आहुति देने वाले — पर्वत-पुत्री पार्वती के उर पर चित्र-पत्र बनाने में एकमात्र शिल्पी — उन त्रिनेत्र शिव में मेरी रति (प्रेम) है।
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॥ श्लोक ८ ॥
नवीन मेघ जैसी कांति वाले
नवीन मेघ मण्डली निरुद्ध दुर्ध रस्फुर
त्कुहूनि
शीथि नीतमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः।
निलिम्प निर्झरी धरस्त नोतु कृत्ति सिन्धुरः
कला निधान बन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥
Navīna-megha-maṇḍalī-niruddha-durdhara-sphurat | Kuhū-niśīthinī-tamaḥ-prabandha-baddha-kandharaḥ | Nilimpa-nirjharī-dharas-tanotu kṛtti-sindhurakha | Kalā-nidhāna-bandhuraḥ śriyaṃ jagad-dhurandharaḥ
नए मेघ-मंडल की घटा जैसे अमावस की रात के घने अंधकार से जिनका कंठ बंधा हुआ है — देवनदी गंगाधर, व्याघ्रचर्मधारी — कलाओं के निधान से सुशोभित, जगत का बोझ वहन करने वाले शिव हमें संपत्ति प्रदान करें।
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॥ श्लोक ९ ॥
सर्वत्र समभाव रखकर सदाशिव का भजन
प्रफुल्ल नीलपङ्कज प्रपञ्च कालिमप्रभा-
वलम्बि कण्ठ कन्दली रुचि प्रबद्ध कन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छि दान्ध कच्छिदं तमन्त कच्छिदं भजे॥
Praphulla-nīla-paṅkaja-prapañca-kālima-prabhā | Valambī-kaṇṭha-kandalī-ruci-prabaddha-kandharam | Smara-cchidaṃ pura-cchidaṃ bhava-cchidaṃ makha-cchidaṃ | Gaja-cchidāndha-ka-cchidaṃ tam-anta-ka-cchidaṃ bhaje
खिले नीले कमल की गहरी श्यामलता की प्रभा से लटकती गले की कंदली (केले की तरह) की शोभा से बंधे हुए — कामदेव के नाशक, त्रिपुर के नाशक, संसार के नाशक, यज्ञ के नाशक — गज के नाशक, अंधकासुर के नाशक, यमराज के नाशक — उन शिव को भजता हूँ।
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॥ श्लोक १० ॥
अखिल विश्व के आदि-अन्त
अखर्व सर्वमङ्गला कला कदम्ब मञ्जरी-
रसप्रवाह माधुरी विजृम्भ णाम धुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्त कान्ध कान्तकं तमन्त कान्तकं भजे॥
Akharva-sarva-maṅgalā-kalā-kadamba-mañjarī | Rasa-pravāha-mādhurī-vijṛmbhaṇā-madhu-vratam | Smara-antakaṃ purā-antakaṃ bhava-antakaṃ makha-antakaṃ | Gajānta-kāndhaka-antakaṃ tam-anta-kāntakaṃ bhaje
अखिल मंगल कलाओं के कदम्ब-मंजरी के रस-प्रवाह की मधुरता में भ्रमर की भाँति रमने वाले — काम के अंत करने वाले, पुर के अंत करने वाले, संसार के अंत करने वाले, यज्ञ के अंत करने वाले — गज, अंधक और यमराज के अंत करने वाले — उन शिव को भजता हूँ।
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॥ श्लोक ११ ॥
जगत-नाशक और कल्याणकर्ता
जयत्व दभ्र विभ्रम भ्रमद्भुजङ्ग मश्वस-
द्विनिर्ग मत्क्रम स्फुरत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धि मिद्धि मिध्व नन्मृदङ्ग तुङ्ग मङ्गलं
ध्वनि क्रम प्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः॥
Jayatva-dabbhra-vibhrama-bhramad-bhujaṅgama-śvasa | Dvinirgamat-krama-sphurat-karāla-bhāla-havya-vāṭ | Dhimid-dhimid-dhimidhvanan-mṛdaṅga-tuṅga-maṅgalaṃ | Dhvani-krama-pravartita-pracaṇḍa-tāṇḍavaḥ śivaḥ
आकाश में घूमते सर्प की श्वास से धधकती ललाट-अग्नि वाले — धिमिद् धिमिद् धिमिद् की गूँजती मंगलकारी मृदंग की ताल पर — प्रचण्ड ताण्डव करते शिव की जय हो।
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॥ श्लोक १२ ॥
पत्थर-सोना समान देखने वाले
दृषद्वि चित्र तल्पयो र्भुजङ्ग मौक्तिक स्रजो-
र्गरिष्ठ रत्न लोष्ठयोः सुहृ द्विपक्ष पक्षयोः।
तृष्णा रविन्द चक्षुषोः प्रजामही महेन्द्रयोः
समं प्रवर्त यन्मनः कदा सदाशिवं भजे॥
Dṛṣad-vicitra-talpayoḥ bhujaṅga-mauktika-srajor | Gariṣṭha-ratna-loṣṭhayoḥ suhṛd-vipakṣa-pakṣayoḥ | Tṛṣṇā-aravinda-cakṣuṣoḥ prajā-mahī-mahendra-yoḥ | Samaṃ pravartayan-manaḥ kadā sadāśivaṃ bhaje
विचित्र शय्या और साधारण भूमि में, नाग-माला और मोती-माला में, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में, तृष्णा और कमल-नयन में, प्रजा और राजा में — समान भाव रखते हुए मेरा मन कब सदाशिव का भजन करेगा?
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॥ श्लोक १३ ॥
अरण्य में रहने वाले वैराग्यमूर्ति
कदा निलिम्प निर्झरी निकुञ्ज कोटरे वसन्
विमुक्त दुर्मतिः सदा शिरःस्थ मञ्जलिं वहन्।
विमुक्त लोल लोचनो ललाम भाल लग्नकः
शिवेति मन्त्र मुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम्॥
Kadā nilimpa-nirjharī-nikuñja-koṭare vasan | Vimukta-durmatiḥ sadā śiraḥ-stha-mañjaliṃ vahan | Vimukta-lola-locano lalāma-bhāla-lagnakaḥ | Śiveti mantra-muccaran kadā sukhī bhavāmyaham
कब देव-नदी के निकुंज-कोटर में निवास करते हुए, दुर्बुद्धि से मुक्त होकर, सदा सिर पर अञ्जलि उठाए — चंचल नेत्रों से मुक्त, सुंदर ललाट पर ध्यान लगाते हुए — "शिव" मंत्र का उच्चारण करते हुए मैं सुखी होऊँगा?
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॥ श्लोक १४ ॥
निर्वाण की प्राप्ति के लिए प्रार्थना
निलिम्प नाथ नागरी कदम्ब मौलि मल्लिका-
निगुम्फ निर्भरक्षरन्म धूष्णि काम नोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदि नींम हर्निशं
परिश्रय प्रदेशमन्तरं च सन्निधत्तु नः॥
Nilimpa-nātha-nāgarī-kadamba-mauli-mallikā | Nigumpha-nirbhara-kṣaran-madhūṣṇikā-manoharaḥ | Tanotu no mano-mudaṃ vinodiniṃ mahārniśaṃ | Pariśraya-pradeśam-antaraṃ ca sannidhatttu naḥ
देव-नगरी की कदम्ब-माला की कलियों के गुच्छों से टपकते मधु की सुगंध से मनोहर — हमारे मन को दिन-रात आनंद और विनोद प्रदान करें — और हमें अपने शरण-स्थल के निकट रखें।
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॥ श्लोक १५ ॥
शिव में ही आश्रय — अंतिम याचना
प्रचण्ड वाडवान लप्रभा शुभ प्रचारणी
महाष्ट सिद्धि कामिनी जना वहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाह कालिक ध्वनिः
शिवेति मन्त्र भूषगो जगज्ज याय जायते॥
Pracaṇḍa-vāḍava-anala-prabhā-śubha-pracāraṇī | Mahāṣṭa-siddhi-kāminī janā-vahūta-jalpanā | Vimukta-vāma-locano vivāha-kālika-dhvaniḥ | Śiveti mantra-bhūṣago jagaj-jayāya jāyate
प्रचण्ड वडवाग्नि की प्रभा की भाँति शुभ संचार करने वाले — महाअष्ट-सिद्धियों की कामना करने वालों को बुलाने में निपुण — मुक्त वामनेत्र और विवाह-काल की ध्वनि — शिव के मंत्र से सुशोभित होने वाले जगत की जय के लिए प्रकट हैं।
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॥ श्लोक १६ — फलश्रुति ॥
पाठ-फल — इस स्तोत्र के जप का फल
इमं हि नित्यमेव मुक्त मुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धि मेति सन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्ति माशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥
Imaṃ hi nityam-evam-uktam-uttamottamaṃ stavaṃ | Paṭhan-smaran-bruvan-naro viśuddhi-meti-santataṃ | Hare gurau subhaktim-āśu yāti nānvathā gatiṃ | Vimohanaṃ hi dehināṃ suśaṅkarasya cintanam
इस उत्तम से उत्तम स्तोत्र को जो नित्य पढ़ता, स्मरण करता और बोलता है — वह निरंतर पवित्र होता रहता है। हरि-गुरु में उसकी शीघ्र सच्ची भक्ति होती है, अन्य कोई गति नहीं होती। शंकर का चिंतन प्राणियों के मोह का नाश करता है।
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॥ श्लोक १७ — फलश्रुति ॥
प्रदोष-काल में पाठ का विशेष फल
पूजा वसान समये दशवक्त्र गीतं
यः शम्भु पूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्र तुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥
Pūjā-avasāna-samaye daśa-vaktra-gītaṃ | Yaḥ śambhu-pūjana-paraṃ paṭhati pradoṣe | Tasya sthirāṃ ratha-gajendra-turaṅga-yuktāṃ | Lakṣmīṃ sadaiva sumukhīṃ pradadāti śambhuḥ
पूजा की समाप्ति पर प्रदोष-काल (सूर्यास्त के डेढ़ घंटे के भीतर) में जो दशमुख रावण द्वारा रचित इस शम्भु-पूजा-परायण स्तोत्र का पाठ करता है — उसे शम्भु सदा रथ, गजराज और घोड़ों सहित स्थिर लक्ष्मी और प्रसन्न मुख प्रदान करते हैं।
॥ इति श्रीदशकण्ठ-रावण-विरचितं शिव-ताण्डव-स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
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