देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् क्या है?
देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् एक भावपूर्ण देवी-स्तुति है जिसमें भक्त अपनी अज्ञानता, पूजा-विधि की कमियों और व्यक्तिगत त्रुटियों के लिए माता से क्षमा की प्रार्थना करता है। इस पृष्ठ पर स्तोत्र का संस्कृत पाठ, Roman transliteration और हिन्दी अर्थ एक साथ दिया गया है।
इस स्तोत्र के रचयिता के रूप में आदि शंकराचार्य का पारम्परिक उल्लेख मिलता है। इसका केंद्रीय भाव “कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति” है—अर्थात भक्त अपनी भूलों के बावजूद मातृ-कृपा और करुणा की शरण लेता है।

देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् — सम्पूर्ण पाठ
कुमाता न भवति ॥
Kumaataa Na Bhavati
क्लेश-हरण — न मन्त्रं नो यन्त्रम्
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥१॥
Na Ca-Ahvaanam Dhyaanam Tad-Api Ca Na Jaane Stuti-Kathaah |
Na Jaane Mudraas-Te Tad-Api Ca Na Jaane Vilapanam
Param Jaane Maatas-Tvad-Anusarannam Klesha-Harannam ||1||
अज्ञान-दरिद्र-आलस्य — विधि-अज्ञान
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥
Vidheya-Ashakyatvaat-Tava Carannayoryaa Cyutir-Abhuut |
Tad-Etat Kssantavyam Janani Sakalo[a-U]ddhaarinni Shive
Kuputro Jaayeta Kvacid-Api Kumaataa Na Bhavati ||2||
विरल-चञ्चल पुत्र — Virala-Tarala
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥
Param Tessaam Madhye Virala-Taralo[a-A]ham Tava Sutah |
Madiiyo-[A]yam Tyaagah Samucitam-Idam No Tava Shive
Kuputro Jaayeta Kvacid-Api Kumaataa Na Bhavati ||3||
अनन्य-स्नेह — Jaganmata
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥
Na Vaa Dattam Devi Dravinnam-Api Bhuuyas-Tava Mayaa |
Tathaa-[A]pi Tvam Sneham Mayi Nirupamam Yat-Prakurusse
Kuputro Jaayeta Kvacid-Api Kumaataa Na Bhavati ||4||
पञ्चाशीति वयस् — निरालम्ब शरण
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥५॥
Mayaa Pan.caashiiter-Adhikam-Apaniite Tu Vayasi |
Idaaniim Cenmaatas-Tava Yadi Krpaa Na-Api Bhavitaa
Niraalambo Lambodara-Janani Kam Yaami Sharannam ||5||
जप-विधि का फल — श्वपाको जल्पाको
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥
Niraatangko Rangko Viharati Ciram Kotti-Kanakaih |
Tava-Aparnne Karnne Vishati Manu-Varnne Phalam-Idam
Janah Ko Jaaniite Janani Japaniiyam Japa-Vidhau ||6||
भवानी का पाणिग्रहण-फल — शिव की महिमा
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥
Jattaa-Dhaarii Kanntthe Bhujaga-Pati-Haarii Pashupatih |
Kapaalii Bhuutesho Bhajati Jagadiishai[a-E]ka-Padaviim
Bhavaani Tvat-Paanni-Grahanna-Paripaattii-Phalam-Idam ||7||
मृडानी नाम-जप — न मोक्ष न विभव
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥
Na Vijnyaana-Apekssaa Shashi-Mukhi Sukhe[a-I]ccha-Api Na Punah |
Atas-Tvaam Samyaace Janani Jananam Yaatu Mama Vai
Mrddaanii Rudraannii Shiva Shiva Bhavaani-Iti Japatah ||8||
श्यामे कृपा — अनाथ पर अनुग्रह
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥
Kim Rukssa-Cintana-Parair-Na Krtam Vacobhih |
Shyaame Tvameva Yadi Kin.cana Mayy-Anaathe
Dhatse Krpaam-Ucitam-Amba Param Tavai[a-E]va ||9||
आपत्काल स्मरण — क्षुधातृषार्त
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥
Karomi Durge Karunnaa-[A]rnnav[a-Ii]eshi |
Nai[a-E]tac-Chattha-Tvam Mama Bhaavayethaah
Kssudhaa-Trssaa-[Aa]rtaa Jananiim Smaranti ||10||
जगदम्ब करुणा — अपराध-परम्परा
परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परापरं
न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥
Paripuurnnaa Karunnaa-[A]sti Cenmayi |
Aparaadha-Paramparaa-Param
Na Hi Maataa Samupekssate Sutam ||11||
समापन — पातकी और पापघ्नी
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥
देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् का मुख्य भाव
इस स्तोत्र में भक्त अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए देवी की शरण ग्रहण करता है। बार-बार आने वाला “कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति” भाव यह बताता है कि भक्त अपने दोषों के बावजूद माता के स्नेह और करुणा पर भरोसा रखता है।
पाठ को केवल शब्दों के रूप में नहीं, बल्कि क्षमायाचना, आत्मचिन्तन और देवी-भक्ति की परम्परा के संदर्भ में समझना उपयोगी है। इस पृष्ठ पर प्रत्येक श्लोक के साथ उसका Roman transliteration और हिन्दी अर्थ दिया गया है ताकि पाठ और समझ दोनों साथ रह सकें।
तस्य सर्वापराधानि क्षमते जगदम्बिका॥
देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् — परिचय
यह अत्यन्त भावस्पर्शी स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है। इसमें भक्त अपनी अज्ञानता, दरिद्रता, आलस्य और कमियों को स्वीकार करते हुए माँ दुर्गा से क्षमा माँगता है। इस स्तोत्र का केन्द्रीय भाव यह है कि पुत्र चाहे कितना भी कुपुत्र हो, माँ कभी 'कुमाता' नहीं बनती।
विशेष रूप से पञ्चम श्लोक में आचार्य कहते हैं कि पच्चासी वर्ष की अवस्था में भी यदि माँ की कृपा नहीं मिली — तो इस निरालम्ब जीव का शरण कौन होगा? यह स्तोत्र नवरात्रि, शुक्रवार और संकट के समय विशेष रूप से पठनीय है।
देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् का पाठ कैसे करें?
पाठ से पहले स्वच्छ होकर शांत स्थान पर बैठें और अपने ध्यान को देवी पर केंद्रित करें। परम्परागत पूजा में दीप या पुष्प अर्पित किए जा सकते हैं; मुख्य बात श्रद्धा और एकाग्रता है।
इस पृष्ठ पर दिए गए संस्कृत पाठ के साथ Roman transliteration और हिन्दी अर्थ का उपयोग करके उच्चारण और भाव को समझते हुए पाठ किया जा सकता है।
देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् कब पढ़ें?
भक्ति-परम्परा में इस प्रकार के देवी-स्तोत्रों का पाठ नवरात्रि, शुक्रवार, प्रातःकाल या व्यक्तिगत प्रार्थना के समय किया जाता है। इसे संकट या आत्मचिन्तन के समय क्षमायाचना की भावना से भी पढ़ा जा सकता है।
किसी एक समय को अनिवार्य मानने के बजाय अपनी साधना, परम्परा और सुविधा के अनुसार नियमित एवं श्रद्धापूर्वक पाठ करना अधिक व्यावहारिक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् क्या है?
यह देवी से क्षमा और करुणा की प्रार्थना करने वाला स्तोत्र है। इसमें भक्त अपनी पूजा-संबंधी कमियों और व्यक्तिगत त्रुटियों को स्वीकार करते हुए माता की शरण लेता है।
देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् के रचयिता कौन हैं?
इस स्तोत्र के रचयिता के रूप में आदि शंकराचार्य का पारम्परिक उल्लेख मिलता है।
इस स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
इस पृष्ठ पर देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम् के बारह श्लोक प्रस्तुत किए गए हैं, साथ में Roman transliteration और हिन्दी अर्थ भी दिया गया है।
“कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति” का क्या अर्थ है?
इसका भाव है कि पुत्र में दोष हो सकते हैं, लेकिन माता को कुमाता नहीं माना जाता। स्तोत्र में यह पंक्ति भक्त के देवी-मातृ करुणा पर भरोसे को व्यक्त करती है।
क्या इसे नवरात्रि में पढ़ सकते हैं?
हाँ, पृष्ठ पर दी गई परम्परागत पाठ-सूचना के अनुसार नवरात्रि देवी-उपासना का विशेष समय माना जाता है और इस प्रकार के स्तोत्र का पाठ उस अवसर पर किया जा सकता है।