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श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः
ॐ
श्रीरामचरितमानस
(सुन्दरकाण्ड) • पृष्ठ ३
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कवि परिचय
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस भक्ति, ज्ञान और मर्यादा का अद्भुत ग्रंथ है, जिसमें श्रीराम की कथा लोकभाषा में अत्यंत सुंदर रूप से प्रस्तुत की गई है।
दोहा
६
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥ ६॥
चौपाई
६
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।
करिहहि कृपा धानुकुल नाथा॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं।
प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहि संता॥
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।
तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती।
करहि सदा सेवक पर प्रीती॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेड़ जो नाम हमारा।
तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥
दोहा
७
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ ७ ॥
चौपाई
७
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी।
फिरहि ते काहे न होहिं दुखारी॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा।
पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही।
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता।
देखी चहउँ जानकी माता॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोड़ रूप गयउ पुनि तहवाँ।
बन असोक सीता रह जहाँ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा।
बैठेहि बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥
दोहा
८
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥ ८ ॥
चौपाई
८
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई।
करइ बिचार करों का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा।
संग नारि बहु किएँ बनावा॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।
साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।
मंदोदरी आदि सब रानी॥
तव अनुचरी करउँ पन मोरा।
एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तून धरि ओट कहति बैदेही।
सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा।
कबहुँ कि नलिनी करड़ बिकासा॥
अस मन समुझ कहति जानकी।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही।
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥
दोहा
९
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि कादि असि बोला अति खिसिआन॥ ९ ॥
चौपाई
९
सीता तैं मम कृत अपमाना।
कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहि त सपदि मानु मम बानी।
सुमुखि होति न त जीवन हानी॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर।
प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥
चंद्रहास हरु मम परितापं।
रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा।
क्रह सीता हरु मम दुख भारा॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा।
मयतनया कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥
मास दिवस महुँ कहा न माना।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥
दोहा
१०
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बूंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥ १० ॥
चौपाई
१०
त्रिजटा नाम राच्छसी एका।
राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना।
सीतहि सेइ करहु हित अपना॥
सपनें बानर लंका जारी।
जातुधान सेना सब खर आरूढ़ नगन दससीसा।
मुंडित सिर खंडित भुज एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई।
लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई।
तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी।
होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं।
जनकसुता के चरनन्हि परीं॥
दोहा
११
जहें तहँ गई सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥ ११ ॥
चौपाई
११
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई।
दुसह बिरहु अब नहि सहि जाई॥
आनि काठ रघु चिता बनाई।
मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि।
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी।
अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला।
मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा।
अवनि न आवत एकउ तारा॥
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी।
मानहुँ मोहि जानि हत भागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका।
सत्य नाम करु हरु मम सोका॥
नूतन किसलय अनल समाना।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
सो छन कपिहि कलप सम बीता॥
सोरठा
१२
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥ १२ ॥
चौपाई
१२
तब देखी मुद्रिका मनोहर।
राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥
जीति को सकड़ अजय रघुराई।
माया तें असि रचि नहि जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना।
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा।
सुनतहि सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनै श्रवन मन लाई।
आदिह तें सब कथा सुनाई॥
श्रवनामृत जेहि कथा सुहाई।
कही सो प्रगट होत किन भाई॥