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श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः
ॐ

सुंदरकांड पाठ हिंदी में

श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
पंचम सोपान • पृष्ठ 3 • Sunderkand Path in Hindi
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दोहा चौपाई सोरठा हिंदी पाठ पृष्ठ 3 / 8

सुंदरकांड पाठ का यह पृष्ठ 3 श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड का क्रमिक भाग है। यहाँ हनुमान जी और विभीषण का संवाद, माता सीता का अशोक वाटिका में होना, रावण और सीता से जुड़े प्रसंग, त्रिजटा का स्वप्न तथा हनुमान जी द्वारा श्रीराम की मुद्रिका दिखाने का प्रसंग मिलता है। यदि आप Sundarkand Path in Hindi पढ़ रहे हैं, तो पृष्ठ 2 के बाद इस पृष्ठ से पाठ जारी रखें।

इस पृष्ठ मेंविभीषण संवाद, अशोक वाटिका, सीता-रावण प्रसंग और राम की मुद्रिका।
पाठ का प्रकारदोहा, चौपाई और सोरठा को अलग-अलग खंडों में रखा गया है।
क्रमपृष्ठ 2 से आगे का पाठ; नीचे पृष्ठ 4 पर जारी रखें।
इस पृष्ठ के प्रमुख प्रसंग

इस भाग में हनुमान जी और विभीषण के बीच संवाद के बाद सीता जी की खोज का प्रसंग आगे बढ़ता है। अशोक वाटिका में सीता जी, रावण का आगमन, त्रिजटा का स्वप्न और हनुमान जी द्वारा राम की मुद्रिका प्रस्तुत करने का प्रसंग इस पृष्ठ के प्रमुख भाग हैं। नीचे पाठ को दोहा, चौपाई और सोरठा के क्रम में प्रस्तुत किया गया है।

दोहा
६
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥ ६॥
चौपाई
६
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।
करिहहि कृपा धानुकुल नाथा॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं।
प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहि संता॥
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।
तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती।
करहि सदा सेवक पर प्रीती॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेड़ जो नाम हमारा।
तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥
दोहा
७
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ ७ ॥
चौपाई
७
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी।
फिरहि ते काहे न होहिं दुखारी॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा।
पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही।
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता।
देखी चहउँ जानकी माता॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोड़ रूप गयउ पुनि तहवाँ।
बन असोक सीता रह जहाँ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा।
बैठेहि बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥
दोहा
८
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥ ८ ॥
चौपाई
८
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई।
करइ बिचार करों का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा।
संग नारि बहु किएँ बनावा॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।
साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।
मंदोदरी आदि सब रानी॥
तव अनुचरी करउँ पन मोरा।
एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तून धरि ओट कहति बैदेही।
सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा।
कबहुँ कि नलिनी करड़ बिकासा॥
अस मन समुझ कहति जानकी।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही।
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥
दोहा
९
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि कादि असि बोला अति खिसिआन॥ ९ ॥
चौपाई
९
सीता तैं मम कृत अपमाना।
कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहि त सपदि मानु मम बानी।
सुमुखि होति न त जीवन हानी॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर।
प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥
चंद्रहास हरु मम परितापं।
रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा।
क्रह सीता हरु मम दुख भारा॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा।
मयतनया कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥
मास दिवस महुँ कहा न माना।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥
दोहा
१०
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बूंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥ १० ॥
चौपाई
१०
त्रिजटा नाम राच्छसी एका।
राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना।
सीतहि सेइ करहु हित अपना॥
सपनें बानर लंका जारी।
जातुधान सेना सब खर आरूढ़ नगन दससीसा।
मुंडित सिर खंडित भुज एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई।
लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई।
तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी।
होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं।
जनकसुता के चरनन्हि परीं॥
दोहा
११
जहें तहँ गई सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥ ११ ॥
चौपाई
११
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई।
दुसह बिरहु अब नहि सहि जाई॥
आनि काठ रघु चिता बनाई।
मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि।
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी।
अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला।
मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा।
अवनि न आवत एकउ तारा॥
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी।
मानहुँ मोहि जानि हत भागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका।
सत्य नाम करु हरु मम सोका॥
नूतन किसलय अनल समाना।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
सो छन कपिहि कलप सम बीता॥
सोरठा
१२
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥ १२ ॥
चौपाई
१२
तब देखी मुद्रिका मनोहर।
राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥
जीति को सकड़ अजय रघुराई।
माया तें असि रचि नहि जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना।
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा।
सुनतहि सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनै श्रवन मन लाई।
आदिह तें सब कथा सुनाई॥
श्रवनामृत जेहि कथा सुहाई।
कही सो प्रगट होत किन भाई॥

सुंदरकांड पृष्ठ 3 में क्या पढ़ें?

इस पृष्ठ पर सुन्दरकाण्ड का वह महत्वपूर्ण क्रम आता है जिसमें हनुमान जी विभीषण से संवाद के बाद अशोक वाटिका में माता सीता को देखते हैं। इसके बाद रावण का आगमन, सीता जी के साथ उसका संवाद, त्रिजटा द्वारा सुनाया गया स्वप्न और अंत में हनुमान जी द्वारा राम की मुद्रिका दिखाने का प्रसंग मिलता है।

  • हनुमान-विभीषण संवाद: रामभक्ति और सीता की खोज से जुड़ा संवाद।
  • अशोक वाटिका: हनुमान जी द्वारा सीता जी को देखने का प्रसंग।
  • रावण और सीता: अशोक वाटिका में रावण के आगमन का पाठ।
  • त्रिजटा का स्वप्न: त्रिजटा द्वारा सुनाए गए स्वप्न का प्रसंग।
  • राम की मुद्रिका: हनुमान जी द्वारा सीता जी को राम की मुद्रिका दिखाना।

Sundarkand Path in Hindi — पृष्ठ 3

यदि आप Sundarkand Path in Hindi या सुंदरकांड पाठ हिंदी में क्रम से पढ़ रहे हैं, तो पृष्ठ 1 और 2 के बाद यह पृष्ठ 3 है। यहाँ दिए गए पाठ को आगे पढ़ने के लिए पृष्ठ 4 पर जाएँ। संपूर्ण सुन्दरकाण्ड पढ़ने के लिए नीचे दिए गए पृष्ठ नेविगेशन का उपयोग करें।