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श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः
ॐ

सुंदरकांड पाठ हिंदी में

श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
पंचम सोपान • पृष्ठ 2 • Sunderkand Path in Hindi
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चौपाई दोहा छंद हिंदी पाठ पृष्ठ 2 / 8

सुंदरकांड पाठ का यह पृष्ठ 2 श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड का क्रमिक भाग है। इस पृष्ठ पर हनुमान जी की सुरसा से भेंट, समुद्र पार करने के बाद लंका का दर्शन, लंकिनी से सामना, लंका में प्रवेश और विभीषण से भेंट से जुड़े चौपाई, दोहा और छंद दिए गए हैं। यदि आप Sundarkand Path in Hindi पढ़ रहे हैं, तो पृष्ठ 1 के बाद यहाँ से पाठ जारी रखें।

इस पृष्ठ मेंसुरसा, लंका प्रवेश, लंकिनी और विभीषण से जुड़े पाठ।
पाठ का प्रकारचौपाई, दोहा और छंद को अलग-अलग खंडों में रखा गया है।
क्रमपृष्ठ 1 से आगे का पाठ; नीचे पृष्ठ 3 पर जारी रखें।
इस पृष्ठ के प्रमुख प्रसंग

इस भाग में हनुमान जी की समुद्र-यात्रा के दौरान सुरसा की परीक्षा, लंका के निकट पहुँचने के बाद लंका का दर्शन और लंकिनी से सामना आता है। आगे हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं और विभीषण से उनकी भेंट होती है। नीचे दिया गया पाठ इन्हीं क्रमिक प्रसंगों को चौपाई, दोहा और छंद के रूप में प्रस्तुत करता है।

चौपाई
१
जात पवनसुत देवन्ह देखा।
जानें कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता।
पठइन्हि आइ कही तेहि बाता॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।
सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावों॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना।
प्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहि ठयऊ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।
तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥
बदन पड़ठि पुनि बाहेर आवा।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥
दोहा
२
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ २ ॥
चौपाई
२
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई।
करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहै कीन्हा।
तासु कपटु कपि तुरतहि चीन्हा॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥
नाना तरु फल फूल सुहाए।
खग मृग बूंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें।
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहि देखी।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥
अति उतंग जलनिधि चहुँ पासा।
कनक कोट कर परम प्रकासा॥
छंद
१
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीर्थी चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथं बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहि बनै॥ १॥
२
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बार्थी सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहि बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ २॥
३
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहि सही॥ ३॥
दोहा
३
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥ ३ ॥
चौपाई
३
मसक समान रूप कपि धरी।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी।
सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी।
रुधिर बमत धरनीं उनमनी॥
पुनि संभारि उठी सो लंका।
जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर बिकल होसि तें कपि के मारे।
तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता।
देखेउँ नयन राम कर दूता॥
दोहा
४
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ ४ ॥
चौपाई
४
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदयै राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।
राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा।
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं।
अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥
सयन किएँ देखा कपि तेही।
मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा।
हरि मंदिर तहँ बनावा॥
दोहा
५
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि भिन्न न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ॥ ५ ॥
चौपाई
५
लंका निसिचर निकर निवासा।
इहाँ कहाँ सज्जन मन बासा॥
मन महुँ तरक करें कपि लागा।
तेहीं समय बिभीषणु जागा॥
राम राम तेहि सुमिरन कीन्हा।
हृदयै हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी।
साधु ते होइ न कारज हानी॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए।
सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई।
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई।
मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी।
आयहु मोहि करन बड़भागी॥

सुंदरकांड पृष्ठ 2 में क्या पढ़ें?

इस पृष्ठ का पाठ सुन्दरकाण्ड के उस क्रम को आगे बढ़ाता है जिसमें हनुमान जी अपनी यात्रा जारी रखते हुए लंका तक पहुँचते हैं। पाठ में सुरसा की परीक्षा, समुद्र पार करने के बाद लंका का वर्णन, लंकिनी से संवाद और लंका में प्रवेश के प्रसंग आते हैं। आगे विभीषण के साथ हनुमान जी की भेंट का पाठ भी मिलता है।

  • सुरसा प्रसंग: हनुमान जी की बुद्धि और रूप-परिवर्तन से जुड़ा पाठ।
  • लंका प्रवेश: लंका के स्वरूप और नगर में प्रवेश का क्रम।
  • लंकिनी प्रसंग: हनुमान जी और लंकिनी के बीच हुआ प्रसंग।
  • विभीषण प्रसंग: लंका में विभीषण से हनुमान जी की भेंट।

Sundarkand Path in Hindi — पृष्ठ 2

यदि आप Sundarkand Path in Hindi या सुंदरकांड पाठ हिंदी में क्रम से पढ़ना चाहते हैं, तो पृष्ठ 1 से शुरू करके इस पृष्ठ पर आएँ। पाठ पूरा करने के लिए नीचे दिए गए अगले और अंतिम पृष्ठ के लिंक का उपयोग करें।